Monday, April 15, 2019

वो ख़्वाब









      वो ख़्वाब सा था, जो रोज़ सुबह उठकर अपने ख़्वाबों को, आसमान के बादलों पर बनाता, उसे जीने की कोशिश करता। वह ख़ुद को हमेशा अपनो से दूर पाता कुछ अलग करता हुआ। कभी सुंदर कपड़ों से सजता हुआ देखता, तो कहीं सुंदर महल, पैरों में चमचमाते हुए जूते, एक बड़ी सी आइसक्रीम खाते हुए, फिर वह ख़्वाब क्या देखता है, आज सब कुछ तो था उसके पास.. पर वह बिलकुल अकेला था, कहीं कोई भी नहीं... सब टीस बनकर चुभने लगा...
वह जीवन नहीं था, मात्र एक छलावा था, जिसे पाना तो ख़्वाब भर था पर सुकून नहीं....
      तभी ख़्वाब टूटता है, किसी ने ख़्वाब के कंधे पर हाथ रखा “अबे छोटू क्या देख रहा है आसमान में, चल खेलते हैं!”
मुस्कुराते हुए चेहरे चल दिए!!

    --Yogita Warde


Pal tum thehar Jao

धागे का हक़दार

                   धागे का हक़दार    पेड़ सरसरा रहे थे , कलकल बहती हुई नदी के साथ हवाएँ भी अपना रस घोल रही थी। वहीं नदी...