Wednesday, June 13, 2018

सन्नाटों से रिश्ता

 



उन सन्नाटों से अजीब सा रिश्ता बन गया,
जब मैंने पूछा इन सन्नाटों मैं क्या मज़ा है... 
कहती थी,यही मेरे सगे पराये, दूजा ना कोई। 

देखा था उसे पत्तियों के ढ़ेर मैं,
उसके लिए कुछ नदारत सा था,
बेबस सी लग रही थीं.. 
जिसकी आस थी वो टूटी सी लग रही थी। 
मैंने पूछा क्या कर रही है... बोली,
मुझे भूख़ लगी हैं। 

रात के अँधेरे मैं एक जलती हुई छोटी सी,
लालटेन लिए बैठी थी,
लगता है.. 
आते जाते बच्चों ने किताबें, पेन्सिल दी थी,
बार बार निहारती गले से लगाती,
मैंने पूछ लिया क्या करोगी इसका?
मुस्कुराते हुए जवाब दिया उसने,
बाबा अम्मा को ख़त लिखकर बुलाऊंगी।

एक दिन गुजरी उस गली से मैं...
बेसुध सी पड़ी हुई थी,
शायद निकल गए थे प्राण,
आते मुझे देर हो गई.. सोचा था पूछूँगी,
उसका ठिकाना.. 
एक मदद के हाथ आने को थे,
पर मदद लेने वाला ही किनारा कर गया... 
फिर कोई अपना नहीं,
वो तो सड़क का मुसाफिर था..
साथ आया और साथ चला गया।


-- योगिता वार्डे






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