Thursday, May 31, 2018

सुबह की पहली किरण









तुम्हारी ताज़गी देखकर,
मन बड़ा खिल उठता है !
सांसें जमा हो जाती है,
कहीं कुछ छोटी मोटी आवाजें,
अच्छी लगती है,
सुकून देती है!
ऐसा लगता है, मानों 
हवा मैं भी ज़िंदगी आ गई हो !!
अँधेरे को चीरती हुई रोशनी,
एक अलग ही समा बांधती है!!
सोचती हूँ ये आती क्यों है रोज़,
हमारे पास !!
हमने तो कभी इसके लिए कुछ किया ही नहीं!
बस किया तो इसका इंतज़ार,
जब रातों को नींद न आए,
सपने हर वक़्त डराएं !!
जो हक़ीक़त ना होते हुए भी,
हक़ीक़त का एहसास कराए !
पर तुम्हे देखकर सब औझल हो जाता है!
हवा की तरह,
सोचती हूँ , कभी तुम अपना
रास्ता भटक गयी
तो हमारा क्या होगा,
तुम सुबह की पहली किरण !!


-- yogita warde 

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