Wednesday, December 5, 2018

लो जी सर्दियाँ आ गई..







लो जी सर्दियाँ आ गई..
       आज ही कमरे की खिड़की खोलने पर एहसास होने लगा, एक हल्की सी सिहरन भरी सुहानी सुबह ने दस्तक जो दी है, ये सुबह साथ मैं माँ की, याद भी ले आई।

       बचपन में, मेरी माँ का प्यार सभी मौसम को छोड़ कर सर्दियों मैं कई गुना बढ़ जाया करता था !

       क्योंकि मेरी क्या सभी माओँ को लगता है कि सर्दियों का खाया बच्चों को अच्छे से लगता है..
  गाजर का हलवा, गोंद वाले आटे के लड्डू, सरसों का साग, मक्का की रोटी, बाजरा,गूढ़ वाली  तिल की चिक्की, गजक,खजूर के लड्डू ओर भी कहीं अनगिनत नाम...

       इन सभी में अपने प्यार के साथ उसे घी मैं डुबो कर अपने बच्चों को खिलाना उन्हें सुकून तो देता ही है , पर उससे कहीं ज़्यादा उन्हें हमारी सेहत बनाने का ख़याल होता है।

        अभी शाम हुई नहीं की सुबह का मेन्यू पहले से ही तैयार  रहता है। हमें ना माँ को अपनी पसंद बताने की ज़रूरत नहीं होती .. "उन्हें सब पता होता है!"

        कभी कभी सोचती हूँ, इतना प्यार ये माएँ लाती कहाँ से है, अपने प्यार अपने जज़्बात एक थाली में परोसना, उस आसमान की तरह है, जो बारिश के बाद बड़ा सुकून मैं लगता है, एक दम साफ़ निश्चल। प्यार की कोई परिभाषा, कोई सीमा नहीं होती,  इसे नापा नहीं जा सकता, बच्चों से माँ का प्यार अंतहीन है ....जो उसे रात मैं एक चेन भरी नींद देता है ..

       उनका प्यार कभी भी एक रोटी तक ख़त्म नहीं होता... “अभी तूने खाया ही क्या है.. एक रोटी ओर ले बेटा”
      अब ना कहीं ना कहीं माँ के  अक़्स मुझमे आने लगे है “क्योंकि अब मैं भी माँ हूँ”!!

️_Yogita Warde


Tuesday, November 27, 2018

तिनके का प्यार




                   तिनके का प्यार 







कुछ सवालों मैं,
उलझी हुई सी जिंदगी?
अक्सर अपना मुकाम ढूंढती हुई,
खड़ी है |
कभी तुम्हारे आगे, कभी तुम्हारे पीछे,
तुम्हारे अक्स अब खत्म हो रहे है,
और मैं भी |
यही कि मैं अब तुम्हारे आगे,  तुम्हारे पीछे,
अपने वजूद को दफना रही  हूँ , "पर नहीं"|
अब तुम्हारे इंतजार को खत्म कर रही हूँ,
"पर नहीं"|
उलझी हुई जिंदगी को और तुम्हारे अक्स को
"पर नहीं"|
अपनी सभी शामों को फिजूल खर्च कर रही हूँ
"पर नहीं"|
अपनी सोच से तुम्हारी सोच तक फासला बना रही हूँ
"पर नहीं"|
तुम्हारे आगे, कभी तुम्हारे पीछे,
खत्म कर रही हूँ , पर यही सोचकर रुक जाती हूँ,
कि जब हम मिलेंगे तो एक तिनके का प्यार,
अगर बचा होगा तो शायद मैं,
बिलकुल तुम्हारे पीछे और तुम्हारे आगे खड़ी रहूँगी...
" उस एक तिनके के प्यार के सहारे "!!

--Yogita Warde 



Monday, September 24, 2018

कुदरत का करिश्मा

 
                                               


                     
         कुदरत का करिश्मा  



कुदरत का करिश्मा देखो,
हर जगह,
हमारे आस-पास कितनी ही,
खूबसूरत चीज़ों को बनाया है इसने।
कभी-कभी छोटी चीज़ों को हम देखते ही नहीं,
यां देखना ही नहीं चाहते।
अब इस लाल फूल को ही देख लो,
इन फूलों की अदा निराली है,
इसकी खूबसूरती शब्दों मैं बयां नहीं की जा सकती।
बस इसे निहारकर महसूस की जा सकती है,
इसकी हर पंखुड़ी उन घटाओं की तरह है,
जिसे दूर से हम हमेशा निहार सकते है,
शायद इसे समझना हर किसी के बस की बात नहीं।
ऐसी खूबसूरती को, अपनी आँखों मैं बंद कर,
हमेशा अपने दिल मैं रख सकते है,
इसके मुरझाने से पहले।
मुरझाना शायद मैं तो क्या ये भी कभी नहीं चाहेगा।
पर इसकी खूबसूरती हमेशा बनी रहेगी....
मेरी कविता मैं मेरी होकर।

--- योगिता वार्डे 





Wednesday, June 13, 2018

सन्नाटों से रिश्ता

 



उन सन्नाटों से अजीब सा रिश्ता बन गया,
जब मैंने पूछा इन सन्नाटों मैं क्या मज़ा है... 
कहती थी,यही मेरे सगे पराये, दूजा ना कोई। 

देखा था उसे पत्तियों के ढ़ेर मैं,
उसके लिए कुछ नदारत सा था,
बेबस सी लग रही थीं.. 
जिसकी आस थी वो टूटी सी लग रही थी। 
मैंने पूछा क्या कर रही है... बोली,
मुझे भूख़ लगी हैं। 

रात के अँधेरे मैं एक जलती हुई छोटी सी,
लालटेन लिए बैठी थी,
लगता है.. 
आते जाते बच्चों ने किताबें, पेन्सिल दी थी,
बार बार निहारती गले से लगाती,
मैंने पूछ लिया क्या करोगी इसका?
मुस्कुराते हुए जवाब दिया उसने,
बाबा अम्मा को ख़त लिखकर बुलाऊंगी।

एक दिन गुजरी उस गली से मैं...
बेसुध सी पड़ी हुई थी,
शायद निकल गए थे प्राण,
आते मुझे देर हो गई.. सोचा था पूछूँगी,
उसका ठिकाना.. 
एक मदद के हाथ आने को थे,
पर मदद लेने वाला ही किनारा कर गया... 
फिर कोई अपना नहीं,
वो तो सड़क का मुसाफिर था..
साथ आया और साथ चला गया।


-- योगिता वार्डे






Thursday, May 31, 2018

सुबह की पहली किरण









तुम्हारी ताज़गी देखकर,
मन बड़ा खिल उठता है !
सांसें जमा हो जाती है,
कहीं कुछ छोटी मोटी आवाजें,
अच्छी लगती है,
सुकून देती है!
ऐसा लगता है, मानों 
हवा मैं भी ज़िंदगी आ गई हो !!
अँधेरे को चीरती हुई रोशनी,
एक अलग ही समा बांधती है!!
सोचती हूँ ये आती क्यों है रोज़,
हमारे पास !!
हमने तो कभी इसके लिए कुछ किया ही नहीं!
बस किया तो इसका इंतज़ार,
जब रातों को नींद न आए,
सपने हर वक़्त डराएं !!
जो हक़ीक़त ना होते हुए भी,
हक़ीक़त का एहसास कराए !
पर तुम्हे देखकर सब औझल हो जाता है!
हवा की तरह,
सोचती हूँ , कभी तुम अपना
रास्ता भटक गयी
तो हमारा क्या होगा,
तुम सुबह की पहली किरण !!


-- yogita warde 

Tuesday, March 6, 2018

मौन

                                                                 
  

                                     मौन  


                                 
हमेशा दो लोगों के बीच जब मौन जगह ले लेता है,
तब शुरू होता है, आंखों को पड़ने का खेल...

ये जब पूरी तरह जीवन में बस चुका होता है, तब
कई जाकर एहसास होता है की कितने ही साल ,
बिना मतलब की बातें कर खराब कर दिए।

मौन रहकर आंखों से बाते करते करते सुकून की
कोई चरम सीमा नहीं रहतीं।

हम बस खोए रहते है, एक दूसरे से सवालों
के जवाब मांगते हुए...
कुछ ऐसा, कुछ वैसा ,
और भी काईं उलझनों के साथ ।

माथे पर लकीरें बनाकर
एक गहरी चुप्पी लिये।

पर मौन कायम है अभी तक और प्यार भी।
इसमें प्यार खत्म होने की कोई गुंजाइश नहीं होती।

क्योंकि वो दिल से किया गया है, दिमाग से नहीं।
जब वो टूटेगा तो सारे सवाल हवा हो जाने है,
वो सिर्फ दिमाग की कल्पनाएं थी, दिल की नहीं।

— yogita warde

                            



Pal tum thehar Jao

धागे का हक़दार

                   धागे का हक़दार    पेड़ सरसरा रहे थे , कलकल बहती हुई नदी के साथ हवाएँ भी अपना रस घोल रही थी। वहीं नदी...